तेजा की बेरी — स्वाभिमान की उस प्यास का नाम, जिसने बंजर धरती को मुकद्दस बसावट में बदल दिया



यह पंक्ति केवल एक कथन नहीं, बल्कि उस जीवंत इतिहास का दरवाज़ा है, जिसके भीतर संघर्ष, श्रम, सम्मान और सामाजिक चेतना की सुगंध आज भी महकती है।



परिचय : भौगोलिक स्थिति एवं नामकरण की दास्तान

जालोर ज़िले की सायला तहसील के दक्षिण-पश्चिमी विस्तार में, जालोर–बाड़मेर राज्य राजमार्ग से मात्र दो किलोमीटर भीतर, शांत सौन्दर्य और प्राचीन आत्मा लिए तेजा की बेरी बसी है। तहसील मुख्यालय से लगभग 29 किलोमीटर दूर स्थित यह गाँव, अपने चारों ओर फैली मरुस्थलीय हवाओं की सरसराहट में भी एक अद्भुत गरिमा बिखेरता है। गाँव की सीमा से होकर गुजरता भारतमाला हाईवे, मानो इस धरती की प्राण-रेखा है—उत्तर के पंजाब से लेकर दक्षिण के गुजरात तक की यात्राओं को जोड़ता हुआ, प्रदेशों के व्यापार, संस्कृति और संपर्क का नया अध्याय रचता है।तेजे ख़ान पन्नू, सिन्धी मुस्लिम समुदाय के वह वीर, श्रमशील और स्वाभिमानी पुरुष, जिनकी जीवनगाथा ने इस निर्जन भूमि को पहचान, प्रतिष्ठा और परम्परा प्रदान की।आज भी इस धरती की हर रेत-कण में उनके संकल्प की थरथराहट महसूस की जा सकती है।


स्थापना और उत्पत्ति : तुड़बी से सोईतरा होते हुए बेरी तक की रोशन राह

तेजे ख़ान मूलतः बाड़मेर ज़िले के हरसानी के समीप बसे छोटे से गाँव तुड़बी के निवासी थे। मवेशियों के लिए उपयुक्त चरागाह की तलाश उन्हें अपने घर की सीमाओं से बहुत दूर ले गई।रास्ते में उनकी यात्रा का एक अहम पड़ाव था सोईतरा (शेरगढ़, फलोदी), जहाँ उनका सान्निध्य एक संत-महाराज से हुआ—एक ऐसा सान्निध्य जिसने उनके मन में आध्यात्मिक विश्वास, श्रमशीलता और आत्मबल का दीपक प्रज्वलित किया।लगभग सन् 1853 के आसपास वे जालोर की इस अछूती भूमि पर पहुँचे। उस समय यह स्थान नितांत सूना था—न खेती,न पेड़,न जलस्रोत। पर जिस मिट्टी को किसी दूरदर्शी ने नहीं देखा, उसे तेजे ख़ान ने अपनी नज़र और नीयत से पहचाना। एक अपमान जिसने दिशा बदल दी — स्वाभिमान की तपिश से जन्मा संकल्प तेजे ख़ान के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी — पानी। वे सांगाना गाँव के एकमात्र कुएँ से मवेशियों के लिए पानी भरते और स्वयं ऊँट की पखाल से अपनी प्यास बुझाते। किन्तु एक दिन भीड़ में खड़े एक बुज़ुर्ग ने ताने के स्वर में कहा -“अगर इतना ही घमण्ड है तो अपने गाँव में कुआँ खोदकर पानी पीना!”शब्द कभी-कभी तलवार से तीखे होते हैं। यह वाक्य तेजे ख़ान के आत्मसम्मान पर ऐसी चोट था जिसने इतिहास की दिशा बदल दी। उसी क्षण उन्हों

ने प्रण किया—

“अपने हाथों से अपना कुआँ खोदेंगे, और अपनी ज़मीन पर अपने श्रम का पानी पीएँगे।”


संकल्प से सृजन : बेरी का जन्म और उस पानी का उजाला

दिनभर मवेशियों की देखभाल के बाद रात में तेजे ख़ान और उनकी धर्मपत्नी दोनों आँचल-भर श्रम से मिट्टी काटते, पत्थर हटाते, धरती की कठोर छाती को छेदते।उनके हाथों के छाले, उनके संकल्प की मिसाल थे।लगभग सन् 1862 में धरती की गोद फटकर मीठा पानी बाहर आया। वह कुआँ केवल जल का पात्र नहीं था—वह आत्मसम्मान का दीप,मेहनत का मंदिर, और सामुदायिक भविष्य की पहली नींव था। इसी कुएँ को आगे चलकर “बेरी” कहा गया, और बेरी के चारों ओर धीरे-धीरे जीवन का पहला अध्याय लिखा जाने लगा।यही बेरी, बाद में पूरे गाँव की पहचान बन गई—तेजा की बेरी।


प्रशासनिक विकास : निर्जन से राजस्व ग्राम और फिर ग्राम पंचायत तक की यात्रा

समय के साथ बसावट बढ़ी, जनसंख्या बढ़ी, और प्रशासनिक स्वरूप भी आकार लिया।

वर्ष 1985 में तेजा की बेरी को शासन द्वारा राजस्व ग्राम घोषित किया गया।गाँव के बढ़ते विस्तार को देखते हुए इससे अलग होकर साजनपुरा नामक नया ग्राम अस्तित्व में आया। दोनों गाँव पहले ग्राम पंचायत सिराणा में सम्मिलित थे। तत्पश्चात वर्ष 2015 में तेजा की बेरी स्वयं एक नवगठित ग्राम पंचायत बनकर उभरी—यह ग्राम की सामाजिक सशक्तता का प्रमाण था। आज यहाँ —प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आंगनवाड़ी केंद्र महात्मा गांधी इंग्लिश मीडियम विद्यालय दो माध्यमिक तथा एक उच्च प्राथमिक विद्यालय समेत अन्य सरकारी सुविधाएं ज्ञान और स्वास्थ्य और सुविधाओ की नई रोशनी फैला रहे हैं। उच्च शिक्षा हेतु युवा जयपुर, जोधपुर, सीकर और कोटा जैसे शैक्षणिक नगरों की राह पकड़ते हैं।

सामाजिक और सांस्कृतिक परिदृश्य : भाईचारे की अनोखी मिसाल

आज तेजा की बेरी लगभग 650 घरों का एक सुव्यवस्थित और प्रगतिशील ग्राम है।यहाँ लगभग 2% हिन्दू आबादी निवास करती है, जबकि मुख्य रूप से सिन्धी मुस्लिम उपजातियाँ —भईया, पन्नू, मेंणु, मंगलिया, खालत, चोनिया, गौड़, खुई, मस्सा, टावरी, जावस —पीढ़ियों से भाईचारे, सौहार्द्र और साझा संस्कृति की मिसाल पेश करती आई हैं।अल्पसंख्यक हिन्दू आबादी होने के कारण कौमी-एकता की अनूठी मिसाल हिन्दू परिवारों को 'लाड़' के रूप में मिलती है जैसे निर्विरोध पंच,उपसरपंच बनाना हो या सामाजिक कार्यक्रमों में एक जाजम पर बैठकर सार्वजनिक निर्णय लेने हो. तेजा की बेरी ने इस विचारधारा को हमेशा जीया है कि धर्म एक व्यवस्था है जिंदगी मानवता है.


खेती, धरती और जल प्रबंधन : मरुस्थल में हरियाली की कहानी

चार दशकों से इस क्षेत्र का जलस्तर स्थिर है—यह उपलब्धि यहाँ के वैज्ञानिक सोच, सामूहिक श्रम और प्राकृतिक संसाधनों के सम्मान का परिणाम है।बीते समय में कुओं और मशीनों से होती सिंचाई, अब ट्यूबवेल, बिजली, ड्रिप सिस्टम और माइक्रो-इरीगेशन के साथ आधुनिक रूप ले चुकी है।यहाँ की मुख्य फसलें —सरसों, गेहूँ,जीरा,इसबगोलइनके साथ अब अनार की उच्च श्रेणी की बागवानी ने गाँव की अर्थव्यवस्था को नई पहचान दी है।


सामाजिक सुधार : एक जागरूक समाज की पहचान

तेजा की बेरी केवल इतिहास का गाँव नहीं—यह सामाजिक चेतना का केंद्र है।यहाँ समय-समय पर कई सामाजिक बुराइयों का परित्याग सामूहिक सहमति से किया गया : मृत्यु भोज का परित्याग विवाह एवं शुभ कार्यों में अत्यधिक खर्च पर नियंत्रण सादगी और सामाजिक एकता के पक्ष में जनमत इन सुधारों के पीछे गाँव के बुज़ुर्गों का विवेक, युवाओं का उत्साह और महिलाओं का मौन किन्तु दृढ़ सहयोग रहा है।


धार्मिक परम्परा : सुन्नी मुस्लिम समाज का आध्यात्मिक केंद्र

तेजा की बेरी में बहुसंख्यक सिन्धी सुन्नी मुस्लिम आबादी सैय्यद शौकत अली शाह जीलानी के मुरीद हैं।उनकी माताजी का मकबरा/दरगाह, जो बाड़मेर मार्ग पर स्थित है, पूरे क्षेत्र का अहम आध्यात्मिक स्थल है।यहाँ प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु अपनी मन्नतें, दुआएँ और दिल की मुरादें लेकर आते हैं। यह दरगाह केवल धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि गाँव की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग है।


निष्कर्ष : स्वाभिमान से जन्मी विरासत और आने वाले समय का उजाला

तेजे ख़ान पन्नू के आत्मसम्मान की चिंगारी ने एक निर्जन भूमि को गाँव, फिर समुदाय, और आज एक सशक्त सामाजिक इकाई में बदल दिया। तेजा की बेरी केवल एक भू-भाग नहीं—यह मेहनत की महक,संघर्ष की आग, सामुदायिक चेतना की रोशनी,और स्वाभिमान की अमिट कहानी है। तेजे ख़ान की बेरी आज भी हवाओं से मानो कहती है—“जब इंसान का इरादा साफ़ हो और पसीना सच्चा हो,

तो बंजर भी अपने भीतर जीवन के सोते उगा देता है।”

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