समझता है तू राज़ है ज़िंदगी,फख्त शौक-ए-परवाज़ है ज़िंदगी, सितारों से आगे जहां और भी है, अभी इश्क(dedication) के इन्तेहा और भी हैं. कहते है ना गर हो इरादों में बुलन्दी तो किसी भी परिस्थिति में इंसान कामयाबी की इबारत लिख सकता हैं. जी हाँ ! हम बात कर रहे है आरएएस 2018 में सफल हुई निरमा भादू की.बीकानेर के नोखा में रहने वाली निरमा ने अपने सघर्ष और समपर्ण को इस तरह निभाया कि उनका आरएएस भर्ती में चयन हुआ है और बता दिया कि मुश्किल परिस्थितियों में कामयाबी को हासिल करना महिला शक्ति की आदत है.और वो बरसो से निभाती आ रही है.
ईश्वर ने भी डगमगाया फिर भी हिम्मत नही हारी
निरमा की शादी के बाद कम उम्र में हीं 2008 में अपने पति को खोया, जिससे वह काफी टूट चुकी थी लेकिन पिता और भाई-बहिन ने हौसला दिया. 2019 में आरएएस की तैयारी के दौरान उनकी माता का निधन हो गया. फिर भी निरमा हिम्मत नहीं हारी क्योंकि उसके जहन में था कि उसे अफसर बनना है.निरमा के पिता किसान है जिन्होंने हमेशा अपनी बेटी को उसके संघर्ष में हौसला दिया. यह वास्तविक जंग है और निसंदेह वास्तविक विजय भी। जीवन का दर्शन ही यही है, प्रतिक्षण और निरन्तर युद्ध...मानसिक व शारीरिक! यही कर दिखाया निरमा ने
यूँ रहा निरमा का सफर
शुरू से पढ़ाई में होशियार निरमा ने अपनी शुरुआती पढ़ाई अपने गांव में ही की. 2008 में बीए, 2013 में एमए और 2009 में बीएड करने के बाद उनमें प्रशासनिक अफसर बनने की ललक जगी. वो कहती हैं कि मेरा सपना था कि मैं अफसर बनकर महिला शक्ति के लिए काम करूँ. फिर क्या हुआ निरमा लग गयी अपने सपनों को साकार करने के लिए. पहली सफलता उन्हें 2011 वरिष्ठ अध्यापक के रूप में मिली उसके बाद सिलसिला शुरू हो गया. 2017 में स्कूल व्याख्याता और 2019 में प्रधानाध्यापक पद पर चयनित होकर बता दिया कि कामयाबी किस्मत की मोहताज नहीं है. निरमा ने इसके साथ-साथ आईएएस की तैयारी के लिए दिल्ली गयीं वहाँ अपने भाई के साथ-साथ आईएएस की तैयारी करते हुए 2013 और 2016 का आरएएस का भी इंटरव्यू दिया. निरमा कहती है कि यूपीएससी की तैयारी के दौरान आरएएस पर ध्यान नहीं दे पायी जिसके कारण वो दो बार असफल रहीं. दोनों इंटरव्यू और यूपीएससी में असफल रहने के बावजूद भी निरमा ने हिम्मत नहीं हारी और 2018 की आरएएस भर्ती में समर्पण भाव से लग गयीं जिसका नतीजा आपके सामने है.वो अब एसडीएम बनने जा रहीं है.उनके पिता और परिवार का सीना गर्व से फूल गया. हर जगह से बधाइयां और शुभकामनाएं आ रहीं है.
निरमा के सघर्ष के समय अनेक साथी थे जो सफल हुए और ऐसे भी अनेक है जो असफल हुए हैं उनके लिए वह कहती है कि जब भी कोई मैच देखता था मेरा ध्यान हमेशा हारने वाली टीम की और ही रहता था..बार-बार यह ख्याल आता था कि किस रणनीति और योजना से हारने वाली टीम को सम्मानजनक स्थिति में लाया जा सकता है।निसंदेह! आज भी पूरी नहीं तो अधिकतम नज़र उन साथियों पर ही है जो सफलता से अभी दूर है। मैं हर वक्त,हरदम नेक और अव्वल प्रयास करूंगा. मेरी जिंदगी का समपर्ण और उद्देश्य ही मेरी सेवा है.


1 Comments
निरमा दीदी का सफ़र वाकई संघर्षपूर्ण था!!💯
ReplyDelete