भविष्य की तलाश में भारत- शौकत अली खान

एक शब्द,
एक राष्ट्र,
 एक संस्कृति,
एक दर्शन,
 एक स्वप्न,
एक इतिहास
     यहा फिर इन सबसे परे गौरव को गढ़ता एक भू-भाग।
चिंतन, चाहिए ऐसा कि देश फिर से उन्नत हो सके । मनन हो ऐसा कि हम परिंदों की संस्कृति जान सके। गुरुर हो इतना कि दुश्मन को जवाब दे सके। हौसला हो इतना कि दूसरों को पहचान दिला सके। कल्पना हो इतनी कि कल, आज फिर से लौट आ जाए।
इतिहास ऐसा रचा जाए कि पुरातन सभ्यताएं अपने वजूद के लिए तरशे। मन हो ऐसा कि हर राष्ट्र-मनोकामना नज़दीक दिखाई पड़ रही हो।
   यही तो वे शब्द हैं जहां मानव बसता हो। दर्शन रचता हो। हम अपने राष्ट्र को कैसे परिभाषित करे ? उन पुरखो की तरह जो सोचा करते थे कि वतन एक घर हैं यहां आज के नफरतगिरी के बाशिंदों की तरह जो सोचते हैं कि भारत एक हिन्दू हैं,मुसलमान हैं,सिख हैं या फलां-फलां।
    चले चलों, कि वो मंजिल अभी बाकी हैं!।
क्यों राष्ट्र निर्माण ? जब राष्ट्र सनातन हैं ,तो उसका निर्माण क्यों? यहीं वो नाज़ुक नुक्ता हैं , जिस पर भारत की सारी व्याख्या निर्भर करती हैं। इस व्याख्या पर ही उसका समूचा भविष्य टिका हैं। यदि सनातन राष्ट्र होता ,तो कभी पराजित न होता । इसका गौरव कभी खोता नही। आज यह दुनिया का सबसे शक्तिशाली मुल्क होता । हजारों साल से इस भारत भूमि में एक राष्ट्र होने की संभावनाएं और परिस्थितियां दोनो रही, इतिहास का एक सत्य यह हैं , पर साथ ही इतिहास का दूसरा सत्य यह भी है कि ये सम्भावनाएं बहुत से कारणों से कभी यथार्थ में नही बदल पाई । जिस युग मे सारी पश्चिमी दुनिया प्रबोधन से प्रेरित हो अपने पुनर्निर्माण में सलंग्न थी , हमने अपनी गुलामी को निमन्त्रित किया और ब्रिटिश उपनिवेशवाद के हाथों खुद को सौंप दिया। यह सब किस प्रक्रिया का परिणाम था ? क्या राष्ट्र होने की यह परिणीति थी या राष्ट्र न होने की विडंबना ? हम क्षत्रपों से घिर भूगोल थे -राष्ट्र नही- यद्यपि युग हमसे वचनबद्धता चाह रहा था।

भारत मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द
 जहां कहीं भी प्रयोग किया जाए
बाकि सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं
इस शब्द के अर्थ
खेतों के उन बेटों में हैं
जो आज भी वृक्षों की परछाईयों से
वक्त मापते हैं
उनके पास ,सिवाय पेट के कोई समस्या नही
और वह भूख लगने पर अपने अंग भी चबा सकते हैं।(पाश)

------------------------
- शौकत अली खान

Post a Comment

0 Comments