तुम्हारा प्रिय होना
किसी को अखरता है
पता नही क्यों किसी कोई खटकता है
इस दुनिया में है सभी माटी के पुतले
कोई रूही सा नाज़ुक, कोई पाणी सा शीतल
फ़िर भी आदमजात शीशे में देखकर निखरता है,
मैं जब से आया हूँ इस धरती पे देखा हैं
इंसान खुद को हुक्मरान समझता है,
यह मुहब्बत तुझसे यह रिश्ते-नाते तुमसे
कोई भला क्या जाने इन उसूलों को
मैं ऐसा किस्सा हर किसी से रखता हूँ
फिर भी इंसान मुझे खुद्दार समझता है
सूरज उगने से पहले,अस्त होने के बाद भी
यह परिंदे आस और विश्वास नही छोड़ा करते
अपनों के हलक का निवाला
उनके लिए दिनभर की ख्वाहिश होती हैं
प्रिय होना गुनाहों की फेहरिस्त से परे है
आदमी तरसता है मुकम्मल अपनेपन को
जिससे वो उसमें जी सके,माँ का प्यार,
पिता की शफ़क़त, बहन का स्नेह
-शौक़त
किसी को अखरता है
पता नही क्यों किसी कोई खटकता है
इस दुनिया में है सभी माटी के पुतले
कोई रूही सा नाज़ुक, कोई पाणी सा शीतल
फ़िर भी आदमजात शीशे में देखकर निखरता है,
मैं जब से आया हूँ इस धरती पे देखा हैं
इंसान खुद को हुक्मरान समझता है,
यह मुहब्बत तुझसे यह रिश्ते-नाते तुमसे
कोई भला क्या जाने इन उसूलों को
मैं ऐसा किस्सा हर किसी से रखता हूँ
फिर भी इंसान मुझे खुद्दार समझता है
सूरज उगने से पहले,अस्त होने के बाद भी
यह परिंदे आस और विश्वास नही छोड़ा करते
अपनों के हलक का निवाला
उनके लिए दिनभर की ख्वाहिश होती हैं
प्रिय होना गुनाहों की फेहरिस्त से परे है
आदमी तरसता है मुकम्मल अपनेपन को
जिससे वो उसमें जी सके,माँ का प्यार,
पिता की शफ़क़त, बहन का स्नेह
-शौक़त
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