सिन्धी समाज का इतिहास मेरी जुबा से ...........



सिन्धी समाज का इतिहास मेरी जुबा से ...........
मारवाड़ मैं मुसलमान राजपूत जगह जगह पाए जाते है.ये सिपाही कहलाते हैं.इनमे हर कौम के राजपूत शामिल है.जो मुसलमानी राज में मुसलमान बनाये गए थे.राजपूतों को मुसलमान बनाने का सिलसला लगभग मुहम्मद बिन कासिम  की चढ़ाई से संवत 770 के करीब अरब की तरफ से सिंध के ऊपर लड़ाई  से हुई थी.से शुरू हुआ था.जिसका खात्मा औरंगजेब के मरने पर संवत 1762 में हुआ.इस 1000 बरस के अरसे में लाखों राजपूत मुसलमान कर दिए गए.शुरू  शुरू मैं जबकि अरबों और तुर्कों मैं हमले होते थे तो यह कायदा था की फ़तेह होने के पीछे आम हिंदुवो और खास कर राजपूतों और दूसरी लड़ने वाली कोमों के आदमियों को या तो मुसलमान कर देते थे या मार डालते थे.की जिससे वे मुकाबला करने लायक न रहे.उस वक़्त राजपूत कौम में जो लड़ाई में हारकर फिर मुकाबला नहीं कर सकते थे,जान बचाने  की दो ही सूरतें थी.या तो मुसलमान हो जाते थे या राजपूती छोड़ करके कमीन जातों में मिल जाते थे. और उन्हीं  का कसाब भी करने लगते थे.आज जो हर कौम में राजपूतों की खान्पें  पाई जाती है वे उन्ही दिनों में मुसलामानों के दबाब से उन मैं शामिल हुई थी. और जो मुसलमान हो जाते थे उनको सिपाहियों में  नोकरी मिल जाती थी.यही लोग जिनकी औलाद कहीं देस्वाली पठान ,कहीं रंधर ,कहीं मुसलमान राजपूत,कहीं सिन्धी सिपाही और कहीं देसवाली   कहलाती है
मारवाड़ राजस्थान में मुस्लिम  राजपूतो के कई थोक है.मगर ये चार बड़े थोक है और सब अपनी असली खांप के नाम से सिपाहियों में जाने जाते है.
1.सिन्धी जो पश्चिम मारवाड़ में होते है
2.देशवाली जो पूर्व मारवाड़ में हर जगह होते है
3.नायक ये जोधपुर मे ज्यादा है
4.क्यामखानी ये चौहान भी जाने जाते है और नागौर,डीडवाना की तरफ बहुत है
सिपाही समाज के इतिहास पर एक नज़र डालने पर ये ज्ञात हुआ की बुजुर्गो के कहे अनुसार समाज के बही-भाट,लंगे,ख्यात और प्राचीन राजघराने से जुड़े परिवारों से सिपाही समाज की जानकारी मिलती है आज भी सिपाही समाज की विभिन जातियों के बही-भाट,जोबनेर के पास आसलपुर से आते है इन भाटो के पास सिपाही समाज का पूरा इतिहास है सिपाही समाज के ज्यादातरलोग जैसलमेरऔर सिंध से आकर राजस्थान के विभिन हिस्सों(राज्यों ) में बस गए.जिन्हें कही सिन्धी,कही सिपाही और दुसरे नामो से भी जाना जाता है बीकानेर में भी सिपाही समाज का एक संगठन है जो समाज की ऐतिहासिक प्रस्ठभूमि पर काम कर रहा है जिन्हें प्रगतिशील सिपाही समाज और प्रगतिशील सिन्धी सिपाहीसमाज कहा जाये तो कोई फर्क नहीं होगा क्योंकि ये संगठन सिन्धी-समाज की जातियों का ही प्रतिनिधि है इस जाति का मूल नाम सिपाही है तो इस जाति का इलाकाई और भोगोलिक नाम सिन्धी है. सिन्धी-सिपाही एक-दुसरे के पर्याय है बाड़मेर से गंगानगर के इलाके तक बसे लोग कही अपने भोगोलिक नाम से जाने जाते है तो कही अपने मूल नाम से जाने जाते है दरअसल में इस जाति के भोगोलिक और मूल नाम को जोड़कर देखा जाये तो इन पूरी जातियो का नाम सिन्धी सिपाही है जो सिंध से आकर बाड़मेर से गंगानगर रिडमलसर बीकानेर तक में बसी हुई है इनकी सभी उपजातियां सामान है और आपस में शादी-ब्याह होते है गंगानगर,हनुमानगढ़ के राठी इलाके में बसी इस जाति को इलाके के लिहाज से राठ कहा जाता है. सिन्धी सिपाही समाज की ऐतिहासिक जानकारी पर अभी शोध जारी है मूल रूप से सिन्धी सिपाही एक ही नस्ल और जाति है
                              शौकत अली खान ,सिन्धी तेजा की बेरी (जालौर)


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