जय हिंद का लोकतंत्र !!


प्रजातन्त्र की परम् पराकाष्ठा जनता में निहित होती है तब तक जब तक उसका अस्तित्व बना रहे। हिंदुस्तान में पेड़ रूपी प्रजातन्त्र की जड़े गहरी है क्योंकि इसके अंकुरण से लेकर विशालकाय बनने तक उन तत्वों का समावेश हुआ जिन्होंने गाँव की गोद मे रहकर देश निर्माण में योगदान दिया,चाहे वो योगदान एक पेड़ उगाकर ही क्यों नही दिया हो।
लोकतांत्रिक तहजीब में देश का हरेक साधारण नागरिक प्रदर्शन कर असाधारण परिचय दे सकता है,उसका सम्मान और बहुमान इस गणतन्त्र को ऊंचाइयां देता है।
चकाचौंध, ग्लैमर, महलों और बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं के रसूखदारों से परे जाकर कल पद्दम पुरस्कारों के वक्त ऐसी तश्वीरें आई जो हिंदुस्तान की सौंधी मिट्टी को गौरवांवित करती है और क्यों नही ? आनी भी चाहिए।
मैं मानता हूँ कि पुरस्कारों का वितरण ओहदों,राजनीतिक पहुंच,राजनीतिक फायदों,लालच से परे होना चाहिए चाहे वो भारत रत्न पुरस्कार हो या फिर गांव,गली,नुक्कड़ में उत्कृष्ट कार्य करने वाले को दिया जाने वाला लौटा,गिलास,या मोमेंटो ही क्यों न हो।
हुकुमचंद पाटीदार जैविक खेती करते हैं। इनके उत्पाद दुनिया के 7 देशों में जाते हैं। जैविक खेती में अपने अमूल्य योगदान तथा पर्यावरण की रक्षा में तत्पर, कर्नाटक की 107 वर्ष की वयोवृद्धा सालुमरदा तिम्मक्का जिनका पर्यावरण सरंक्षण का जीवनपर्यंत योगदान उनको असाधारण बना गया। भारतीय गणतन्त्र के सर्वोच्च पद ने भी उनको सम्मानित करते वक्त अपने प्रोटोकॉल को दरकिनार किया और उनके आशीर्वाद को सर-माथे लिया।
देश की सवा सौ करोड़ आबादी में देश निर्माण के नागरिको को चुनना वाकई यह सूझ-बूझ व निष्पक्ष व निर्भय काम था।
चयनित समिति के इन कार्यो की प्रेरणा हर गांव तक पहुंचे ऐसी आशा और उम्मीद है।
"जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिस में
बंदों को गिना करते हैं तौला नहीं करते "
~ शौक़त

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