प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने मुख्य
न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर का रोना,कई–न-कई भारतीय न्यायपालिका का रोना माना गया
हैं| कार्यपालिका एंव न्यायपालिका के बीच यह टकराव तब से हैं जब से सरकार ने
न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन किया और बाद में न्यायपालिका द्वारा इसे ख़ारिज किया
गया |
जजों की नियुक्ति के सम्बन्ध में
पुरानी कॉलेजियम प्रणाली को बरकरार रखना ही उचित समझा जिसमे न्यायाधीशों की नियुक्ति
को स्वतंत्र रूप दिया जाए | भारत के प्रधान न्यायाधीश ने न्यायपालिका की पीड़ा
व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बताया ,हालाँकि प्रधानमंत्री के
द्वारा भरोसा भी दिया गया |
इतनी भारी-भरकम जनसंख्या वाले देश में न्यायपालिका को मजबुत एंव स्वतंत्र
रखा जाना आवश्यक माना जाना चाहिए | भारत में हर स्तर के न्यायालयों में मुकदमों का
अम्बार लगा पड़ा हैं, जिसमे निचली अदालत से लेकर देश की शीर्ष अदालत तक | वर्तमान
में देश लगभग 2 करोड़ मुकदमे लम्बित पड़े हैं ,उनसे निपटने के लिए जजों की भी तो
आवश्यकता होती हैं लेकिन ऐसा नाटकीय बर्ताव कई वर्षो से चलता आ रहा हैं|
आज हमारी सरकारे मेक इन इण्डिया ,डिजिटल
इण्डिया जैसी योजनाओं की बाते कर रही हैं तथा देश की अर्थव्यवस्था को मजबुत बनाने
के लिए हर सम्भव प्रयास कर रही हैं, कभी यह भी सोचा हैं कि देश का आर्थिक विकास भी
कई –न –कई न्यायपालिका से जुड़ा हुआ हैं |
विधि आयोग की 1987 की रिपोर्ट के अनुसार
प्रत्येक दस लाख आबादी पर पचास जज होने आवश्यक हैं लेकिन हालियाँ स्तिथि को जाने
तो देश में प्रति दस लाख आबादी पर सिर्फ एक जज काम कर रहा हैं|
विश्व में लोकतान्त्रिक देशों की श्रेणी
में शीर्ष स्थान रखने वाले हमारे देश की न्यायपालिका में रुलाहट क्यों आ रही हैं?
इनके कारणों का पता लगाना आवश्यक हैं| न्यायपालिका का अपमान एक तरह से देश की जनता
का अपमान माना जाता हैं| आज गरीब से गरीब सैकड़ो चक्कर लगाने पर भी न्याय की आस नही
कर सकता| यह सभी हमारी लचीली न्याय व्यवस्था सुधारने की और संकेत कर रहें यह सुधार
तब होगा जब सरकार न्यायपालिका की सुनेगी ,सुनना ही नही अपितु उस पर अम्ल करना इससे
भी अति-आवश्यक होगा |
आज कोर्ट की काली कोठरी में लगातार घंटो काम करना हमारे न्यायधीशो की आदत
बन चुकी हैं ,इतने मुकदमे लम्बित हैं की वे ना तो परिवार के साथ ना ही समाज के साथ
अपना समय बीता सकते हैं| इतना सारा बोझ हमारी न्यायपालिका पर होने के कारण हम
त्वरित न्याय की आस नही कर सकते |
हमारे
सविंधान निर्माताओं ने अपनी दूरदृष्टि सोच के साथ फ़्रांसिसी दार्शनिक मोंटेस्क्यु
के सत्ता के विभाजन के सिद्धान्त को भारतीय सविंधान में दर्ज किया और वर्षो से इसे
व्यवहार में भी लाया जा रहा है|
न्यायिक नियुक्ति आयोग के फैसले पर न्यायपालिका
ने सरकार पर कठोर टिप्पणीयाँ भी की थी जिससे कार्यपालिका के दिल पर काटें के भांति
चुभी हुई होगी लेकिन देश की जनता का
न्यायपालिका पर विश्वास हैं और देश यह उम्मीद भी करता हैं कि कार्यपालिका और
न्यायपालिका मिलकर इस समस्या का समाधान करेगी|
0 Comments