लम्हों ने ख़ता की है सदियाँ सजा पाएगी ...
शायद ! आप और हम सभी जानते होंगे कि छोटी उम्र का जनाजा बड़ा दुखदायी होता है और यह भी जानते होंगे कि बहन का प्यार माँ के बाद दूसरा बड़ा प्यार होता है ...
कश्मीर की ठण्ड जिस्म को ज्यादा ही दर्द देती है चाहे वो स्त्रीमय हो या पुरुषमय , साथ ही इसमे एक दर्द और शामिल हो जाए तो दर्द की सीमाएं बढ़ जाती है ।
चलो ! कुछ गलत सुनते है ..
वादियों के घने जंगल आज भी चीत्कार से लबालब हो जाते है जब उन्हें उस गुनाह का गवाह बनना पड़ा जो गुनाह कभी बख़्शिश का बहाना नही होता । धर्म अपनी अश्मिता के आँचल में रो रहा है आज भी और सदियों तक रोएगा ...
हर दिन की तरह उस दिन भी आशिफ़ा अपने मवेशियों को लेकर जंगल मे जा रही थी । बैखोफ ! निड़र ! बचपना ! इसलिए कि वो इंसान है और वह जानती थी कि उसकी अस्मिता और स्वतंत्रता दीर्घकाल यानी कि उसके जनाजे तक साथ निभाएगी।
उधर इंसानी दरिंदे हैवानियत से सरोबार हो चुके थे और राक्षस होने के गौरव से गौरान्वित .. फिर क्या हुआ मैं नही बता सकता क्योंकि मेरी भी एक इंसानी सीमा है .......इजाज़त नही देती कलम की स्याही ।
तड़फती , बिलखती आशिफ़ा आठ दिन तक मर्दानगी के हवस का शिकार होती रहीं ...स्वयं के बेटी होने का कारण ढूंढती रही ...दरिंदे उसके शरीर को नौंच रहे थे ...राक्षसों की तादाद दिनों-दिनबढ़ रही थी ....और अशिफ़ा कि बुझी आंखे भगवान की और टिकी हुई थी। उसको मालूम ना था। जिसकी और देख वो रहम की भीख मांग रही है । हक़ीक़त व फ़साने में उलझी आशिफ़ा सोच रही थी कि ना अल्लाह होता ना ईश्वर ना मैं इंसान और ना ही कुछ और ...
ज़ालिमों के ज़ुल्म से जहन्नुम की शिकार आशिफ़ा हर दर्द भुलाने के लिए कोशिशें कर रही थी ...बेहोशी के इंजेक्शन और दवाएं उस पर जीत चुकी थी .... अंततः उसे मार दिया गया कि कोई कुछ भी ना बचे ...
उस रात से आठ दिन तक आशिफ़ा खुद से ज्यादा ईश्वर को रुला गयी थी ....
फिर बात फैल जाती है ... इंसानियत में, मीडिया में,दरिंदो में,माँ ओ तक, बेटियों तक हर और ...निर्भया के बाद यह ईश्वर और इंसान को शर्म से झुकाने वाली दूसरी कहानी थी ....
अब बात हुकूमत ! सियासत ! संविधान! स्वतन्त्रता ! सुरक्षा ! बेटियो से जुड़ी सैकड़ो योजनाओं कि है जिसके नाम पर सियासत बनाई जाती है ....सत्ता की रोटियां सेकी जाती है ...
घटनाएं तो हर दिन घटती रहती है लेकिन कुछ दर्दनाक ही सुर्खियों में रहती है।
मुद्दे का पक्ष भी लिया जा रहा है और विरोध भी ,पक्ष लेने वाले शायद वो घरो में माँ-बहनों के वजूद पर कलंक है ....धोखा है अपने जन्म के साथ ।
वो दरिंदे किसी ना किसी बहन के भाई होंगे ,किसी ना किसी माँ के बेटे ... हैवानियत के छींटे उनके घरों को भी बदनाम कर गए होंगे जब वो घरो की और लोटे होंगे ...
सवाल यह है कि क्या देश को बेटियों की सुरक्षा में उलझा लिया जाए? या न्याय की परिभाषा को बदल दिया जाए .....
"ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने,लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई " रज्मी की यह पंक्तियों हमारे भविष्य को गहरा धक्का देगी ...
सोचिये ! विचार कीजिये आज बेटियों की सुरक्षा कन्या भूर्ण हत्या से ज्यादा महत्वपूर्ण है ।
©shoukat Ali Khan

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