मुहब्बत के गीत गाइये💓

क़ुदरत ने इस माटी के पुतले को कितनी मुहब्बत से बनाया होगा,बनावट से भरपूर यह मानव अपने जीवन का सर्वोत्कृष्ट उपहार है। बरस के बरस गुजर गए पीढ़ियों ने धर्म के धर्म बदल दिए,मुल्कों ने सरहदें खींच दी। बेबसी की यह दर्दनाक यातना सिर्फ इंसान ही सहता जा रहा हैं।

इसी दुनिया मे रहने वाले हरेक बाशिंदा सिर्फ अपनी अंतिम श्वास की फिक्र में जुटा हुआ है। उसने इंसानी धर्म तो कभी का त्याग लिया है।

मुल्क बने,सिस्टम बना सिस्टम ने कानून-क़ायदे बनाये और इन क़ानूनों का इसलिए बनना लाजमी था क्योंकि हमने इंसानी रूह से त्याग करना शुरू कर दिया है वरन नियम तो बेनियमों,बेजुबानों के लिए बनते है।

ख़ुदा का शुक्र रहा तो हम फिर इंसानियत में लौट आएंगे जुनून,जज्बे और बिना बहकावे के साथ। खैर ! नस्ले बढ़ रही है इसलिए हम आशा ही कर सकते है दावा नही।

ईर्ष्या, घृणा रूपी समंदर में डूबी हुई नस्लें तैरा नही करती सिर्फ डूबा करती है जिसका जीवन क्षणभंगुर होता है और अतीत पर्दे में तथा कलंक लिए होता है।

इसलिए मुहब्बत के गीत गाइये, शुक्र मनाइये इस परवरदिगार का कि जिसने हमें इंसानी नस्ले से नवाजा है।

मेरी डायरी से...
©शौक़त


फोटो-गूगल से अज्ञात वेब

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